ई है बम्बई नगरिया

मित्रों आज कल एक नेगेटिव पब्लिसटी का चलन तेजी से फैल रहा है चाहे वो राजनीति हो या फिल्म इंड्रस्टी .
राजनीति में बेशक ये दांव कभी कभार उल्टा पड़ जाये मगर फिल्म इंड्रस्टी ये दांव करोड़ों के वारे न्यारे के साथ सफलता की पूर्ण गारंटी देता है.
आइये थोड़ा सा उस खेल को समझने की कोशिश करते हैं,
मान लिया मैंने किसी फिल्म का निर्माण किया 200 करोड़ लगा दिए मगर कोई इस फिल्म को क्यों देखने जाये इसके लिए कुछ मसाला अवश्य चाहिए तो इसके लिए 10 करोड़ बाजार में फेंके जाते हैं कोई शिगूफा छोड़ दिया कि इसमें अमुक धर्म की अमुक जाति पर अश्लील टिप्पणी को गई है और इसके लिए सोशल मीडिया पर एक्टिव कुछ कंपनियों को बाकायदा कुछ धनराशि दी जाती है ताकि वे इसका भ्रामक प्रचार जन जन तक कर सकें इसके दो दिन बारी आती है कि जिस जाति या समुदाय पर टिप्पणी की गयी है उसके कुछ ठेकेदार दल्लों को कुछ टुकड़े फेंक दिए जाते हैं और वो झूठी बिलबिलाहट का ढोंग करके धर्म और जाति के खतरे में होने की दुहाई देते हैं और फिर शुरू होता है उन ठेकेदारों के कुछ मूर्ख समर्थकों का बेबकूफी भरा खेल देखते ही देखते बात बम्बई से होते हुए समूचे देश में फ़ैल जाती है ,
रोज नई बातें सोशल मीडिया के माध्यम से आमजन को बताई जाती हैं कि अमुक जगह इतनी भीड़ ने प्रदर्शन किया और आमजन में कौतूहल बढ़ जाता है कि आखिर ऐसा क्या है जो इस फिल्म का विरोध किया जारहा  है और वो बेसब्री से फिल्म की रिलीज़ का इंतजार करते हैं 10 12 दिन बहुत बड़ा बबाल होने के बाद ठेकेदार चुप बैठ जाते हैं , काम हो चुका होता है छिटपुट विरोध के बीच फिल्म रिलीज़ होती है और भीड़ बस ये जानने के लिए सिनेमा हॉल पर टूट पड़ती है कि आखिर वो टिप्पणी क्या थी ?
और शुरू हो जाती है बेशुमार कमाई और ठेकेदारों और दलालों का कमीशन पहुंचा दिया जाता है सब कुछ सामान्य होजाता है और निर्देशक और निर्माता फिर एक नई कहानी पर काम करना शुरू कर देते हैं ।

इसका ताजा तरीन उदहारण पद्मावती फिल्म के विरोध का ही है , बिना जाने ही कुछ लोग विरोध पर उतर आये हैं और यही विरोध उनकी सफलता की गारंटी है ।

एक और फिल्म टॉयलेट एक प्रेम कथा के साथ हुआ मथुरा नंदगांव के बाबा लोग सिर्फ इसलिए विरोध पर उतर आये की टॉयलेट नाम जोड़ कर ब्रिज की संस्कृति को धूमिल किया जारहा है ।
अरे यार माफ़ करो और वो जो तुम अनपढ़ जाहिल लोग लोटा लेके खुले में निपट लेते हो उससे क्या ब्रिज की संस्कृति में चार चांद लग जाते हैं ?
वो जो तुम्हारे मंदिरों में पर्यटकों के साथ खुली लूट चलती है उससे क्या चार चांद लग जाते हैं?

तो हम अभी बात कर रहे थे कि कैसे फिल्म का विरोध उनको हिट बनाता है ?

पीके याद थी किस तरह से ठेकेदार भड़के और फिर जबरजस्त सुपर हिट होने के बाद सब चुप बैठ गए ।
जब तुम कहाँ मर जाते हो जब फिल्म की शूटिंग चल रही होती है ?
तब विरोध क्यों नहीं करते क्योंकि तब आपको ठेका नहीं मिला होता ।

मेरा उद्देश्य किसी धर्म संगठन या समुदाय की आस्था और सोच को ठेस पहुँचाना नहीं था मैं तो बस यही कहना चाहूंगा कि ..

ई है बम्बई नागरिया तू देख बबुआ!

बाकी आप खुद समझदार हैं इसी के साथ मैं अब्बू जाट अपनी लेखनी को विराम देता हूँ .

धन्यवाद

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