स्कूल के दिन
याद आते हैं वो स्कूल के दिन
न जाते थे स्कूल दोस्तों के बिन ।
कैसी थी वो दोस्ती कैसा था वो प्यार,
एक दिन की जुदाई से डरते थे जब आता था शनिवार ।
चलते चलते पत्थरों में मारते थे ठोकर,
कभी हस कर चलते थे कभी नाराज होकर ।
कंधे पर बैग लिए हाथों में बोतल पानी,
किसे पता था बचपन के प्यार को बिछुड़ा देगी जवानी ।
याद आते हैं वो स्याही से बिगड़े हाथ ,
क्या दिन थे जब हम करते थे लंच साथ ।
खेल खेल में उसका अपने आप इतराना,
मेरी नई साइकिल से उसको चलाना सीखना ।
रविवार के बाद जब आता था सोमवार ,
दूसरी मंजिल पर बैठ कर करता था इन्तजार ।
नौ बजते ही जब वो आजाती थी,
हमारे चेहरे पर मुस्कान छाजाती थी ।
दोस्ती तकरार का ये सिलसिला चल रहा था,
वक्त धीरे धीरे अपना रूप बदल रहा था ।
उन्होंने स्कूल बदला हम उसी में रह गए,
दिल के सारे अरमान दिल में ही रह गए ।
वक्त गुजरा और अचानक से एक मुलाकात हुई,
पास बैठे मेरे कुछ सवालात हुए कुछ बात हुई ।
उन्होंने कुछ कहा और बड़े आराम से समझाया,
बातों ही बातों में शायरी करना सिखाया ।
अब लिखना ही है कर्म मेरा इश्क की कोई इच्छा शेष नहीं ,
अब लेखक हूँ साहिब मुझमें मजनूँ का कोई अवशेष नहीं ।
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